What is an Overdraft Facility and How Does it Work?
December 26, 2025 | 4 mins read
सीआरआर यानी कैश रिज़र्व रेशियो भारत की मौद्रिक नीति का एक प्रमुख उपकरण है जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) नियंत्रित करता है। यह वह अनुपात है जो बैंकों को अपनी कुल जमा राशि का एक निश्चित प्रतिशत आरबीआई के पास नकद रूप में रखने के लिए बाध्य करता है। आइये विस्तार से समझते हैं कि सीआरआर क्या है, इसके लाभ क्या हैं और यह आपकी जेब को कैसे प्रभावित करता है।
कैश रिज़र्व रेशियो का अर्थ है: वाणिज्यिक बैंकों को अपनी कुल नेट डिमांड एंड टाइम लायबिलिटीज (एनडीटीएल) का एक निर्धारित प्रतिशत नकद रूप में आरबीआई के पास अनिवार्य रूप से जमा करना होता है।
यह राशि बैंकों द्वारा ऋण देने या निवेश के लिए उपयोग नहीं की जा सकती। सीआरआर सुनिश्चित करता है कि बैंकों के पास हमेशा न्यूनतम नकद उपलब्ध रहे, जिससे तरलता और स्थिरता बनी रहती है।
सीआरआर आरबीआई द्वारा मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान तय किया जाता है। यह बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 के अंतर्गत आता है। आरबीआई हर द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में सीआरआर में बदलाव कर सकता है। इस बदलाव का सीधा असर बैंकों की उधार क्षमता और ब्याज दरों पर पड़ता है।
कैश रिज़र्व रेशियो का महत्व भारतीय बैंकिंग प्रणाली में बहुआयामी है:
संक्षेप में, सीआरआर आरबीआई का एक प्रमुख उपकरण है, जिससे वह अर्थव्यवस्था में धन प्रवाह और महंगाई को नियंत्रित करता है।
एनडीटीएल वह कुल राशि है जो बैंक पर ग्राहकों और अन्य संस्थाओं की देनदारी है। इसमें शामिल हैं:
एनडीटीएल की गणना में अन्य बैंकों में जमा राशि घटाई जाती है।
सीआरआर = (आरबीआई के पास रखी नकद राशि ÷ एनडीटीएल) x 100
मान लीजिए XYZ बैंक की एनडीटीएल ₹ 1,000 करोड़ है और सीआरआर दर 3% है। तो बैंक को आरबीआई के पास ₹ 30 करोड़ (₹ 1,000 x 3% = ₹ 30 करोड़) नकद के रूप में रखने होंगे। शेष ₹ 970 करोड़ सैद्धांतिक रूप से उधार देने और निवेश के लिए उपलब्ध रहता है।
भारत में सीआरआर आरबीआई द्वारा मौद्रिक नीति के अनुसार निर्धारित होता है। यह दर स्थिर नहीं है, बल्कि आर्थिक स्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलती रहती है।
आरबीआई नियमित अंतराल पर (लगभग 6-8 सप्ताह) पर मौद्रिक नीति की समीक्षा करता है और आवश्यकता के अनुसार सीआरआर में बदलाव करता है। वर्तमान सीआरआर दर के लिए आरबीआई की आधिकारिक वेबसाइट (rbi.org.in) पर नवीनतम मौद्रिक नीति वक्तव्य देखें।
सीआरआर में बदलाव का तत्काल असर बैंकों की उधार क्षमता, ब्याज दरों और अंततः ऋण की उपलब्धता पर पड़ता है।
सीआरआर दर मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास के संतुलन को ध्यान में रखकर तय की जाती है:
एल एंड टी फाइनेंस जैसी एनबीएफसी पर सीआरआर सीधे लागू नहीं होता, लेकिन बैंकिंग प्रणाली की तरलता उनकी फंडिंग लागत और ऋण दरों को प्रभावित करती है।
सीआरआर के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं:
सीआरआर बैंकिंग प्रणाली और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाता है।
सीआरआर और वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) दोनों आरबीआई द्वारा बैंकों पर लगाई गई आरक्षित आवश्यकताएं हैं, लेकिन दोनों में महत्वपूर्ण अंतर है:
| विशेषता | सीआरआर | एसएलआर |
|---|---|---|
| आरक्षित रूप | केवल नकद | नकद, सोना, सरकारी प्रतिभूतियां |
| जमा स्थान | आरबीआई के पास | बैंक के पास ही |
| ब्याज | आरबीआई कोई ब्याज नहीं देता | सरकारी बॉन्ड पर ब्याज मिलता है |
| उद्देश्य | मुद्रा आपूर्ति नियंत्रण | बैंक की तरलता और सॉल्वेंसी सुनिश्चित करना |
| बैंक उपयोग | उपयोग नहीं कर सकते | एसएलआर संपत्तियां धारण कर सकते हैं |
दोनों मिलकर बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता और ग्राहकों की जमा राशि की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
सीआरआर भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुस्तरीय प्रभाव डालती है:
बड़े स्तर पर सीआरआर परिवर्तन शेयर बाजार को भी प्रभावित करता है, क्योंकि इससे बाजार में ब्याज दरें और तरलता बदलती है।
सीआरआर यानी कैश रिज़र्व रेशियो भारतीय मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण आधार है, जो बैंकिंग प्रणाली को स्थिर और तरल बनाए रखता है। सीआरआर में बदलाव सीधे आपके लोन की लागत, ब्याज दरों और निवेश माहौल को प्रभावित करता है, इसलिए इसकी समझ निवेशकों और उधारकर्ताओं जैसे एल एंड टी फाइनेंस दोनों के लिए जरूरी है।
भारत में आरबीआई के साथ पंजीकृत सभी वाणिज्यिक बैंकों पर सीआरआर अनिवार्य रूप से लागू होता है।
बैंक आरबीआई के पास सीआरआर के रूप में जमा नकद पर कोई ब्याज नहीं पाते। यही कारण है कि सीआरआर में वृद्धि से बैंकों के पास उपयोग योग्य धन कम हो जाता है, जिससे उनकी लागत बढ़ सकती है।
एनडीटीएल में बचत खाता, चालू खाता, सावधि जमा, आवर्ती जमा, देय चेक और अन्य बैंकों पर देनदारियां शामिल होती हैं।
सीआरआर बढ़ने पर बैंकों के पास ऋण देने के लिए कम धन बचता है, जिससे ब्याज दरें बढ़ सकती हैं। लोन महंगा होता है और मांग घट सकती है।
सीआरआर वह अनुपात है जो बैंकों को आरबीआई के पास जमा रखना होता है। रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्पकालिक ऋण देता है। दोनों अलग मौद्रिक नीति उपकरण हैं।
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति नियमित अंतराल (लगभग 6-8 सप्ताह) पर बैठक करती है। सीआरआर में बदलाव आर्थिक जरूरत के अनुसार किसी भी बैठक में हो सकता है।
सीआरआर कटौती से बाजार में अधिक नकदी आती है, जो शेयर बाजार के लिए सकारात्मक होती है। सीआरआर वृद्धि से तरलता कम होती है और बाजार पर दबाव आ सकता है।
अस्वीकरण:
यह लेख केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से है। वर्तमान सीआरआर दर आरबीआई की नवीनतम मौद्रिक नीति घोषणा पर निर्भर करती है। किसी भी वित्तीय निर्णय से पहले आरबीआई की आधिकारिक वेबसाइट या वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें।